जब हनुमानजी ने की थी भगवान स्वामीनारायण की रक्षा | एक अनसुनी गाथा | JAI SWAMINARAYAN

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भगवान स्वामीनारायण का जन्म 3 अप्रैल 17 उत्तर प्रदेश, भारत में हुआ था । उन का असली नाम घनश्याम पांडे था तथा इनके पिता का नाम श्री हरि प्रसाद राय माता का नाम भक्ति देवी था ।
इनके माता-पिता ने ही इनका नाम घनश्याम रखा था । बालक के हाथ और पद और पैरों से ब्रज उधर्व रेखा तथा कमल का चिन्ह देखकर ज्योतिषियों ने यह कह दिया कि यह बालक लाखों लोगों को जीवन की सही दिशा देगा
Aaj hum aapko swaminarayan bhagwan ki ek aisi katha ke bare me bataenge jab swaya bhagwan hanumanji ne unki raksha ki thi
Kaalidat naam ka ek asur tha, jo prithvi vasiyo kar bahot atyachar karta tha,
Jab kaalidat ko gyat hua ki chapaiya naam ke gaon me dharmadev aur bhakti devi ke ghar bhagwan ghansyam ne janma liya hai, tab vo bahot krodhit ho utha.
Tab usne asuro ko ekatha kar kaha, balak ghanshyam hamare liye khatre ka sandesh hai, mera hokum hai abhi dharam dev ke ghar jao aur ghansyam ki mrityu nischit karo.
Bhayanak asuro aur unki aag ugalti aakhein ghanshyam ko marne nikal pade.
Apne dhardar hathyaro ke sath unhone dharmdev ke ghar ko gher liya, unhone khidki me jaagte hue dekha ki ghansyam apni maa ke sath the.
Aur mauka milte hi balak ghansyam ko bhaktimaa se chin kar asur bhag nikale,
Ek ped ke niche bhagwan hanuman visharam kar rahe the, unhone balak ghansyam ko asuro ki kaid me dekha, hanumanji ne turant hi apni daiviya Shakti ki takat se ek badi chalang mar kar asuro ki kaid se balak ghansyam ko chhuda liya aur zameen par surakshit rakh diya, asur rakshas ghyanshyam ko lene wapas aaye.
Magar shaktishali hanumanji ke samne unki kuch na chali, hanuman aur danavo ke beech ghamasan yudh hua, hanumanji ne saare asuro ko parajit kar diya. Saare danavo ko mu ki khani padi, zakhmi hue danavo ne hanumanji ki Shakti ke samne ghutane tek diye aur maafi mang kar chhod ne ko kaha.
Dayalu hanumanji ne unhe maaf karke chhod diya, aur balak ghanyam ko bahot sambhalte hue dukhi hui bhakti maa ko sop diya.
Aur kaha” lijiye bhakti mata sambhaliye aapke balak ghansyam ko, unki suraksha ke liye aap kabhi bhi chintit naa hona, ve to bhagwan hai, aur main unka bhakt hu, main hamesha unki seva me hazir rahunga.
Bhagti mata ne balak ghansyam ko gale laga liya.
Zakhmi asur log kalidat ke paas wapas gaye, aur kalidat ko saari kahani sunayi, ye sunkar kalidat ko krodh aa gaya aur unhone maha rakshasi krutya ko bulaya
Aur kalidat ne use kisi bhi halat me ghansyam ko marne ka hukum diya.
Raksasi dharma dev ke ghar pahochi aur balak ghansyam ke akele hone ka mauka dhundane lagi, bhakti mata balak ghansyam ko lori sunakar unhe sulane ki koshish kar rahi thi. Jab ghansyam so gaye tab bhaktidevi kuch kaam se bahar chali gayi,
Raksasi ne mauka dekhkar ghanshaym ke sir par madarane lagi, usi samay balak ghanyam ne apni aankhein kholi, rakshasi ke upar unki dhrasti padte hi, ghanshyam ki aakhion se ek adhrishya Shakti prakashne lagi, rakshasi aag ki jwala me lipat gayi, aur madat ke liye chilla ne lagi, uski chilla ne ki awaaz sunkar dharmdev aur bhakti mata waha aa gaye aur sab dekh kar ghabara gaye, aur ghanyam to bas jaise kuch hua hi nahi aise jule me khel rahe the, bhagti mata ko bhagwan hanuman ki baatein yaad aayi aur unke mukh par sneha chalak gaya.
Isi prakar hanumanji ne bhagwan swaminarayan jinhe ghanshyam bhi kaha jaata hai unki raksha kithi
Jai swaminarayan
Jai hanuman

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आखिर खुल ही गया शनिवार और मंगलवार को हनुमानजी की पूजा करने का सबसे बड़ा रहस्य

आखिर खुल ही गया शनिवार और मंगलवार को हनुमानजी की पूजा करने का सबसे बड़ा रहस्य

मंगल ग्रह का सम्बंध मंगलवार से और मंगलवार का हनुमान जी के जन्म से अर्थात् महावीर बजरंगबली का जन्म मंगलवार हो हुआ। सभी मतों, सम्प्रदायों स्थानों पर यह प्रमाण सर्वत्र रूप से स्वीकार किया गया है। जन्म तिथि के विषय में मतभेद अवश्य मिलते हैं। यथा– 
मेष संक्रमणं भानौ सम्प्राप्ते मुनिसत्तमा:
पूर्णिमाख्ये तिथौ पुण्ये चित्रा नक्षत्र संयुते॥ (स्क.पु.)
अर्थात चैत्र मास की पूर्णिमा को, जबकि सूर्य मेष राशि पर थे, तब चित्रा (चित्रा नक्षत्र के स्वामी मंगल हैं) नक्षत्र में हनुमान जी का जन्म हुआ। उत्तर भारत में चैत्र शुक्ल नवमी को श्रीराम का जन्मोत्सव और चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को हनुमान जयंती मनाई जाती है। , मंगलवार को जन्म वार और चित्रा नक्षत्र हनुमान जी का जन्म नक्षत्र कहलाता है।
कहींकहीं चैत्र शुक्ला एकादशी को मघा नक्षत्र में हनुमान जी का जन्म बतलाते हैं और कहीं कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को अथवा कार्तिक पूर्णिमा को भी। परन्तु चैत्र शुक्ल पूर्णिमा, चित्रा नक्षत्र और मंगलवार अत्यधिक प्रचलित हैं और मान्य भी हैं। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को जन्म, ज्योतिष की दृष्टि से इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि कार्तिक में सूर्य तुला राशि में होते हैं। नीच राशिगत सूर्य में हनुमत जैसे तेजस्वी सूर्य प्रधान बालाजी का जन्म हो ही नहीं सकता।
मंगलवार को जन्म होने के कारण हनुमान जी की पूजा आराधना, साजश्रृंगार, चोला परिवर्तन  मंगलवार को किये जाते हैं। हनुमानजी मंगलवार को किए गये पूजापाठ से अति प्रसन्न होते हैं।
मंगलवार को हनुमान जी की सामान्य से अधिक पूजापाठ करने से मंगल ग्रह की भी अनुकूलता बनी रहती है। झगड़ेफसादों से रक्षा होती है, अत्यधिक आवेश पर नियंत्रण होता है, अग्नि सम्बंधी दुर्घटनाओं से रक्षा होती है, प्रतिस्पर्धा के क्षेत्रों में विजय मिलती है। 
जिन्हें मंगल ग्रह की अशुभ स्थिति में होने के कारण अथवा दशान्तर्दशा के कारण कष्ट मिल रहे हों तो उन्हें मंगलवार को विशेष रूप से हनुमान जी के पूजापाठ करने चाहियें।
मंगलवार को पूजा करने का आधार हनुमान जी के जन्म से लिया जाता है लेकिन शनिवार को पूजा का क्या आधार है? यह भी जान लेना चाहिये
पहली बात तो यह कि मतान्तर से कहींकहीं शनिवार को हनुमानजी का जन्म वार माना जाता है मतानुसार हनुमान जी सेवाभावी हैं और शनिदेव भी सेवा की भावना या अवसर देते हैं। दूसरी बात यह है कि

एक बार जब सूर्यास्त होने वाला था। शान्त वातावरण में शीतल मन्दसुगन्ध पवन बह रही थी। हनुमानजी महाराज रामसेतु के समीप ही ध्यानस्थ होकर परम प्रभु श्रीराम की मनमोहक झांकी का आनन्द ले रहे थे। ध्यानावस्था में मग्न होने से बाह्य परिस्थितियों का आभास भी उन्हें नहीं था। 
ठीक उसी समय सूर्य पुत्र `शनिदेव` समुद्र पर टहल रहे थे। शनिदेव को अपनी शक्ति और पराक्रम का अहंकार हो गया था। उनके बाजु फड़क रहे थे। वे मन में सोच रहे थे कि मुझमें अपार शक्ति है। संसार मे मेरा मुकाबला करने वाला कोई नहीं है। सामना करना तो दूर, मेरे आगमन की सूचना से ही बड़ेबड़े दिग्गज भी काँप उठते हैं। मैं कहाँ जाऊँ, किसके पास जाऊँ, जो मुझसे युद्ध कर सके? मेरी शक्ति का कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है। 
इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि उनकी नजर ध्यानमग्न हनुमान जी पर पड़ी। उन्होंने वज्रदेह हनुमान को पराजित करने का निश्चय किया। सूर्यदेव उस समय अस्त होने वाले थे, जिससे शनिदेव की देह का वर्ण अत्यंत काला और भयानक हो गया। 
हनुमान जी के समीप पहुँचकर उन्होंने हनुमान जी को युद्ध के लिए ललकारा, और कहा–  रे बंदर! मैं प्रख्यात शक्तिशाली शनिदेव तुम्हारे सामने उपस्थित हूँ। तुम ये पाखण्ड छोड़कर खड़े हो जाओ और मुझसे युद्ध करो। 
तिरस्कृत और अपमानजनक कटु वाणी सुनकर हनुमान जी ने नेत्र खोले और शालीनता से पूछामहाराज! आप कौन हैं और यहां किसलिए पधारे हैं
शनिदेव ने घमंड में चूर होकर कहामैं परम तेजस्वी सूर्यदेव का परम पराक्रमी पुत्र शनि हूँ। यह संसार मेरा नाम सुनते ही काँप उठता है। मैंने तुम्हारे साहस के कई किस्से सुन रखे हैं। इसलिए आज मैं तुम्हारी शक्ति की परीक्षा करना चाहता हूँ। सावधान हो जाओ, मैं तुम्हारी राशि पर रहा हूँ। 
तब भी हनुमान जी ने कहाशनिदेव! मैं प्रभु का सुमिरन कर रहा हूँ, संध्या काल है, भजन में व्यवधान मत डालिये और युद्ध का विचार छोड़ दीजिए घमण्ड में आकर शनिदेव ने कहामैं कहीं जाकर लौटना नहीं जानता और जहाँ जाता हूँ, वहाँ अपना प्रभाव स्थापित कर देता हूँ। सम्भवत: शनिदेव तब तक वक्री नहीं होते होंगे। हनुमान जी पुन: पुन: शनिदेव को टालते रहे कि शनिदेवमैं वृद्ध हो गया हूँ। क्यों मुझे परेशान कर रहे हो? मुझे भजन करने दीजिए और युद्ध के लिए अन्य कोई वीर ढूंढ लीजिए। 
लेकिन शनिदेव कहाँ मानने वाले थे। वे और उत्साहित हो कर बोले। कायरता तुम्हें शोभा नहीं देती है। तुम्हारी स्थिति देखकर मुझे तुम पर दया रही है, पर फिर भी मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूँ। इतने पर भी हनुमान जी तैयार नहीं हुये तो शनिदेव ने हनुमान जी का हाथ पकड़ लिया और ललकारा। हनुमान जी ने झटका कर अपना हाथ छुड़ा लिया। शनिदेव पुन: पुन: दुस्साहस करने लगे। तब महावीर ने कहाआप ऐसे नहीं मानेंगे और अपनी पूँछ को बढ़ाना प्रारम्भ किया तथा शनिदेव को उसमें लपेट लिया। सूर्यपुत्र शनिदेव का सारा अहंकार टूट गया, वे कंठ तक पूँछ से बँध गये और दर्द के मारे छटपटाने लगे। अब हनुमान जी का राम सेतु की परिक्रमा का समय हो गया था। इसलिए वे दौड़ते हुये परिक्रमा लगाने लगे। दौड़ते समय पूँछ बारबार पत्थरों से टकरा रही थी, जिससे शनिदेव को चोट लग रही थी। हनुमान जी जानबूझकर पत्थरों पर पूँछ को पटक रहे थे। शनिदेव की दुर्दशा हो गई, पूरा शरीर रक्त से लथपथ हो गया। उनको अपार कष्ट और पीड़ा हो रही थी। तब शनिदेव अत्यन्त कातर स्वर में प्रार्थना करने लगेहे भक्तराज! हे करुणामय! मुझ पर कृपा कीजिए। मैंने अपनी उद्दण्डता का दण्ड पा लिया है। आप मुझे मुक्त कीजिये, मुझे प्राणों का दान दीजिए। 
तब हनुमानजी खड़े हुये और दर्द से तड़पते हुए शनिदेव से कहने लगेयदि तुम मेरे भक्तों को कष्ट नहीं दो, उनकी राशि पर अपने अशुभ प्रभाव नहीं दो तो मैं तुम्हें अभी मुक्त करता हूँ, अन्यथा मैं तुम्हें कठोर दण्ड दूँगा। शनिदेव ने कहामैं आपको दिया वचन याद रखूँगा। आपके भक्तों को मैं कभी कष्ट नहीं दूँगा। जो कोई आपकी पूजा आराधना करता रहेगा, उसकी राशि पर स्वभाववश मैं आऊंगा तो सही लेकिन उसे कष्ट और पीड़ा नहीं दूंगा। आप शीघ्र ही मुझे बंधन से मुक्त कीजिए। हनुमान जी ने शनिदेव को छोड़ दिया। शनिदेव के शरीर में असह्य  पीड़ा हो रही थी। पीड़ा से राहत पाने के लिये हनुमान जी ने कहा कि  आप शरीर पर तेल की मालिश करिये, दर्द से राहत मिलेगी। तब शनिदेव तेल मांगने लगे। आज भी शनिवार को शनिदेव को तेल चढ़ाया जाता है। तेल से शनिदेव अति प्रसन्न होते हैं। आयुर्वेद में भी शनिवार को तेल की मालिश सुन्दरता में वृद्धि करती है जबकि रविवार को रोगकारी सिद्ध होती है। 
मंगलवार को प्रात:काल और शनिवार को सायंकाल में हनुमानजी की पूजापाठ करने से हनुमानजी अति प्रसन्न होते हैं। मंगल और शनि: इन दोनों ग्रहों का संबंध हनुमानजी से विशेष रूप से जुड़ा हुआ है। मंगल ग्रहजनित बाधाओं में ऊर्जा की अधिकता हो जाने से उसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं। ऊर्जा को जिसे कि व्यक्ति का साहस कहते हैं, हनुमान जी ही नियंत्रित करते हैं। साहस जब दुस्साहस बन जाता है तो दु:खदायी हो जाता है। इसी तरह शनि ग्रहजनित बाधाओं में शारीरिक दुर्बलता, कायरता, मतिभ्रम की स्थिति बनती है। इन सब विसंगतियों का निवारण केवल हनुमान जी ही कर सकते हैं क्योंकि– 
बुद्धि हीन तनु जानिके, सुमिरौ पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार॥

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हनुमानजी का संकटमोचन हनुमानाष्टक कर देगा आपका बेड़ा पार|Sankat Mochan Hanuman Ashtak Meaning in Hindi

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Hanuman asthak benefits
Hanuman Ashtak is particularly beneficial to ward off the evil spirits. Hanuman is the repository of all eight Maha Siddhis. He is the mightiest one and just in helping the good, humble and the pious. Reciting Hanuman Ashtak is known to drive away evil spirits and protect the devotees from their harms and troubles. In addition, Hanuman Ashtak will clear away fears and scary thoughts. It is therefore advised that kids and young children should worship Lord Hanuman and chant Hanuman Ashtak.
Sade Sati is a dreaded phase of every individual and occurs when an individual come under the influence of Lord Shani. Most people report unbearable sufferings, troubles and challenges in life during the seven and half year period when Sade Sati rules their horoscopes. The mythological stories say that Hanuman saved the life of Shani quite a few times and therefore Shani was impressed by him. Shani is said to have assured that he will not harm the devotees of Hanuman. Chanting Hanuman Ashtak is a sure way to please Shani Dev and win his blessings besides reducing the intensity of the Sade Sati period.
Human life is prone to several mishaps. We all commit several sins daily both knowingly and unknowingly. Chanting Hanuman Ashtak is like asking for Hanuman’s pardon to forgive you and protect you from being harmed by your sins. Chant Hanuman Ashtak at least once a day before bedtime to reduce the impacts of the sins your commit. It will also enhance your moral consciousness and help you avoid doing sin in future.
The best time to chant Hanuman Ashtak is before going to bed. The mantra fills your heart with fearlessness, clarity and the power of right judgment. Fears, worries, pain and disappointments, you faced during the day, will be removed from your heart. You will enjoy a peaceful and sound sleep. Hanuman removes all the obstacles from your life and you will feel that an unseen energy is by your side supporting and guiding you all through the journey of your life. Therefore, you must make Hanuman Ashtak your life long companion.

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कैसे शिव के वीर्य से हनुमानजी ने जन्म लिया? जानिए उनकी अतुलित शक्तियों का राज़

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हनुमान जी की अतुलित शक्तियों का राज?
रामभक्त हनुमान को हम नाजाने कितने ही नामों से पूजते हैं। कोई उन्हें पवनपुत्र कहता है तो कोई महावीर, कोई अंजनीपुत्र बुलाता है तो कोई कपीश नाम से उनकी अराधना करता है। भगवान शिव ने अनेक अवतार लिए, जिनमें से सर्वश्रेष्ठ हैं महावीर हनुमान। शिवपुराण के अनुसार त्रेतायुग में दुष्टों का संहार करने के लिए हनुमान ने शिव के वीर्य से जन्म लिया था।
शिवपुराण में हुए उल्लेख के अनुसार समुद्रमंथन के बाद देवताओं और राक्षसों के बीच अमृत का बंटवारा करने के लिए विष्णु जी ने मोहिनी का आकर्षक रूप धारण किया था। मोहिनी को देखकर कामातुर शिव ने अपनी लीला रचते हुए वीर्यपात किया जिसे सप्तऋषियों ने सही समय का इंतजार करते हुए संग्रहिहित कर लिया था।
जब वक्त आया तब सप्तऋषियों ने शिव के वीर्य को वानराज केसरी की पत्नी अंजनी के कान के माध्यम से उनके गर्भ तक पहुंचाया। शिव के इसी वीर्य से अत्यंत पराक्रमी और तेजस्वी बालक हनुमान का जन्म हुआ था।
वाल्मिकी रामायण के अनुसार हनुमान अपने बाल्यकाल में बेहद शरारती थी। एक बार सूर्य को फल समझकर उसे खाने दौड़े तो घबराकर देवराज इन्द्र ने उनपर वार किया। इन्द्र के वार से हनुमान बेहोश हो गए, जिसे देखकर वायु देव अत्याधिक क्रोधित हो उठे। उन्होंने समस्त संसार को वायु विहीन कर दिया। चरों ओर त्राहिमाम मच गया। तब स्वयं ब्रह्मा ने आकर हनुमान को स्पर्श किया और हनुमान होश में आ उठे। उस समय स भी देवतागण हनुमान के पास आए और उन्हें भिन्न-भिन्न वरदान दिए।
सूर्यदेव द्वारा दिए गए वरदान की वजह से ही हनुमान सर्वशक्तिमान बने। सूर्यदेव ने उन्हें अपने तेज का सौवा भाग प्रदान किया और साथ ही यह भी कहा कि जब यह बालक बड़ा हो जाएगा तब स्वयं उन्हीं के द्वारा ही शास्त्रों का ज्ञान भी दिया जाएगा। सूर्य देव ने उन्हें एक अच्छा वक्ता और अद्भुत व्यक्तित्व का स्वामी भी बनाया। सूर्यदेव ने पवनपुत्र को नौ विद्याओं का ज्ञान भी दिया था।
यमराज ने हनुमान को यह वरदान दिया था कि वह उनके दंड से मुक्त रहेंगे और साथ ही वह कभी यम के प्रकोप के भागी भी नहीं बनेंगे।
कुबेर ने हनुमान जी को यह वरदान दिया था कि युद्ध में कुबेर की गदा भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी। कुबेर ने अपने सभी अस्त्र-शस्त्रों के प्रभाव से हनुमान को मुक्त कर दिया।
महावीर का जन्म शिव के ही वीर्य से हुआ था। महादेव ने कपीश को यह वरदान दिया कि किसी भी अस्त्र से उनकी मृत्यु नहीं हो सकती।
देवशिल्पी विश्वकर्मा ने हनुमान को ऐसी शक्ति प्रदान की जिसकी वजह से विश्वकर्मा द्वारा निर्मित किसी भी अस्त्र से उनकी मृत्यु नहीं हो पाएगी, साथ ही हनुमान को चिरंजीवी होने का वरदान भी प्रदान किया।
इन्द्र देव ने हनुमान जी को यह वरदान दिया कि उनका वज्र भी महावीर को चोट नहीं पहुंचा पाएगा। इन्द्र देव द्वारा ही हनुमान की हनु खंडित हुई थी, इसलिए इन्द्र ने ही उन्हें हनुमान नाम प्रदान किया।
वरुण देव ने हनुमान को दस लाख वर्ष तक जीवित रहने का वरदान दिया। वरुण देव ने कहा कि दस लाख वर्ष की आयु हो जाने के बाद भी जल की वजह से उनकी मृत्यु नहीं होगी।
हनुमान को अचेत अवस्था से मुक्त करने वाले परमपिता ब्रह्मा ने भी हनुमान को धर्मात्मा,परमज्ञानी होने का वरदान दिया। साथ ही ब्रह्मा जी ने उन्हें यह भी वरदान दिया कि वह हर प्रकार के ब्रह्मदंडों से मुक्त होंगे और अपनी इच्छानुसार गति और वेश धारण कर पाएंगे।
पौराणिक दस्तावेजों के अनुसार सभी देवी-देवताओं ने हनुमान जी को अपनी शक्तियां और वरदान प्रदान किए थे, जिसके परिणामस्वरूप पवनपुत्र बेरोकटोक घूमने लगे थे। उनकी शैतानियों के कारण सभी ऋषि-मुनी परेशान हो गए थे। वे तपस्या में लीन मुनियों को भी तंग किया करते थे।
जिसकी वजह से एक बार अंगिरा और भृगुवंश के मुनियों ने क्रोधित होकर उन्हें श्राप दिया कि वे अपनी सभी शक्तियां और बल भूल जाएं और इसका आभास उन्हें तभी हो, जब कोई उन्हें याद दिलाए।
इस घटना के बाद हनुमान बिल्कुल सामान्य जीवन जीने लगे। उन्हें अपनी कोई भी शक्ति स्मरण नहीं थी। भगवान राम से मुलाकात के बाद जब सीता को खोजने के लिए लंका जाना था, तब समुद्र लांघने के समय स्वयं प्रभु राम ने हनुमान जी को उनकी शक्तियों का स्मरण करवाया था।
जब सीता की खोज करते हुए हनुमान जी लंका पहुंचे तब बड़ी मशक्कत करने के बाद आखिरकार उन्हें मां सीता दिखाई दीं। जब हनुमान जी ने सीता मां को अपना परिचय दिया तब सीता मां उनसे अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्हंं अमरता के साथ यह भी वरदान दिया कि वे हर युग में राम के साथ रहकर उनके भक्तों की रक्षा करेंगे।
हनुमान चालीसा की पंक्तियां “अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता” का अर्थ है कि मां देवी सीता से महावीर को ऐसा वरदान प्राप्त हुआ जिसके अनुसार कलयुग में भी वह किसी को भी आठ सिद्धियां और नौ निधियां प्रदान कर सकते हैं। आज भी यह माना जाता है कि जहां भी रामायण का गान होता है, हनुमान जी वहां अदृश्य रूप में उपस्थित होते हैं।
रावण की मृत्यु और लंका विजय करने के बाद भगवान राम ने हनुमान को यह वरदान दिया था “जब तक इस संसार में मेरी कथा प्रचलित रहेगी, तब तक आपके शरीर में भी प्राण रहेंगे और आपकी कीर्ति भी अमिट रहेगी”।

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ये रहे भारत के 10 प्रसिद्ध और अद्भुत हनुमान मंदिर, जहां आज भी होता है चमत्कार

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Top 10 Famous hanuman temples in India
हिन्दू मान्यता के अनुसार हनुमान, माता अंजनी और वानर राज केसरी के पुत्र हैं। चैत्र शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को हनुमान जयंती मनायी जाती है। मंदिरों में जाकर सिर्फ हनुमान जी की पूजा अर्चना करने से ही लाभ नहीं होता बल्कि हनुमान जी की किसी भी एक अच्छाई को अपनाना और उसे बढ़ावा देना हमारे जीवन को सार्थक कर सकता है। वैसे तो हर शहर के हर इलाके में एक हनुमान मंदिर अवश्य होता है। एक नजर डालें भारत के 10 सबसे प्रसिद्ध और अद्भुत हनुमान मंदिरों पर-
बड़े हनुमान जी (इलाहाबाद)
हनुमान गढ़ी (अयोध्या)
सालासार बालाजी (राजस्थान)
संकटमोचन मंदिर (वाराणसी)
गिरिजाबांध हनुमान मंदिर (रतनपुर)
मेहंदीपुर बालाजी ( राजस्थान)
हनुमान धारा (सीतापुर)
कष्टभंजन हनुमान मंदिर (सारंगपुर)
पंचमुखी आंजनेयर हनुमान (तमिलनाडू)
महावीर मंदिर (पटना)

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इस रहस्यमयी गांव में न किसी घर में दरवाज़ा न लगते ताले वजह जानकर चौक जायेंगे आप- शनि शिंगणापुर

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आस्था और भगवान
क्या आप आस्था में विश्वास करते हैं? यदि हां तो आप शायद महाराष्ट्र के इस गांव के लोगों की भावनाओं को समझ सकें। एक ऐसा गांव जो केवल भगवान भरोसे चलता है। एक ऐसा गांव जो सुख एवं दुख का मालिक भगवान को ही मानता है। इस गांव के वासियों के लिए भगवान की महिमा से बढ़कर और कुछ नहीं है।
शिंगणापुर गांव
महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित है शिंगणापुर गांव, जिसे शनि शिंगणापुर के नाम से जाना जाता है। यह गांव हिन्दू धर्म के विख्यात शनि देव की वजह से प्रसिद्ध है, क्योंकि इस गांव में शनि देव का चमत्कारी मंदिर स्थित है। जी हां, चमत्कारी…. यह शब्द हम इस गांव में हो रहे चमत्कारों को देखते हुए ही इस्तेमाल कर रहे हैं।
महाराष्ट्र में है स्थित
यदि कभी मौका मिले तो आप महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य के इस छोटे से गांव में जाकर तो देखिए। यह गांव शिरडी से अधिक दूर नहीं है। मैं स्वयं इस गांव में गई हूं… गांव की ओर जाता हुआ रास्ता काफी अच्छा और साफ है। रास्ते में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर गन्ने का रस मिलता है। कुल मिलाकर गांव तक पहुंचने का सफर काफी अच्छा होता है।
हैरान करने वाली जगह
लेकिन गांव में पहुंचते ही जो नज़ारा आप देखेंगे वह आपके आंखों को अच्छे-से खोलकर रख देगा। आपको शायद यकीन ना हो लेकिन इस गांव के किसी भी घर या दुकान में दरवाज़ा नहीं है। जी हां… बीते कुछ समय में यह गांव अपनी इसी खासियत से देश-दुनिया में काफी मशहूर हुआ था।
यहां दरवाज़ा नहीं है
लेकिन यहां दरवाज़ा क्यों नहीं प्रयोग किया जाता? इसके पीछे भी गांव के मंदिर से जुड़ी आस्था है। लोगों का मानना है कि इस गांव पर भगवान शनि का इतना असर है कि कोई चोर गलती से भी यहां चोरी नहीं कर सकता। और यदि कभी चोरी कर भी ली तो चोरी हुई वस्तु को गांव से बाहर नहीं लेकर जा सकता।
शनि देव की कृपा
शनि देव उसे ऐसे जाल में फंसा देते हैं कि वह चोरी की गई वस्तु को गांव से बाहर ले जाने में असमर्थ हो जाता है। गांव वालों के मुताबिक यह महज कहानी नहीं है बल्कि सत्य है, क्योंकि कुछ चोरों ने इस बात को कुबूल किया है कि वे चोरी करने के बाद गांव के बाहर नहीं जा सके, बस रास्ता भटकते रहे।
लोगों को नहीं है किसी का भय
यही कारण है कि खुद को सुरक्षित महसूस करने वाले गांव के वासी ना तो अपने घरों में कोई दरवाज़ा लगाते हैं और ना ही अपनी महंगी वस्तुओं को ताला लगाकर बंद करते हैं। क्योंकि उन्हें भगवान शनि पर विश्वास है कि उनकी कोई भी वस्तु चोरी नहीं होगी।
गांव की कहानी
चलिए अब आपको वह कहानी सुनाते हैं जिसके चलते शिंगणापुर गांव में शनि देव की इतनी महिमा बढ़ गई। कहते हैं एक बार इस गांव में काफी बाढ़ आ गई, पानी इतना बढ़ गया कि सब डूबने लगा। लोगों का कहना है कि उस भयंकर बाढ़ के दौरान कोई दैवीय ताकत पानी में बह रही थी। जब पानी का स्तर कुछ कम हुआ तो एक व्यक्ति ने पेड़ पर एक बड़ा सा पत्थर देखा।
गांव वालों को मिला एक पत्थर
ऐसा अजीबोगरीब पत्थर उसने आज तक नहीं देखा था, तो लालचवश उसने उस पत्थर को नीचे उतारा और उसे तोड़ने के लिए जैसे ही उसमें कोई नुकीली वस्तु मारी उस पत्थर में से खून बहने लगा। यह देखकर वह वहां से भाग खड़ा हुआ और गांव वापस लौटकर उसने सब लोगों को यह बात बताई।
चमत्कारी पत्थर
सभी दोबारा उस स्थान पर पहुंचे जहां वह पत्थर रखा था, सभी उसे देख भौचक्के रह गए। लेकिन उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि आखिरकार इस चमत्कारी पत्थर का क्या करें। इसलिए अंतत: उन्होंने गांव वापस लौटकर अगले दिन फिर आने का फैसला किया।
शनि देव प्रकट हुए
उसी रात गांव के एक शख्स के सपने में भगवान शनि आए और बोले ‘मैं शनि देव हूं, जो पत्थर तुम्हें आज मिला उसे अपने गांव में लाओ और मुझे स्थापित करो’। अगली सुबह होते ही उस शख्स ने गांव वालों को सारी बात बताई, जिसके बाद सभी उस पत्थर को उठाने के लिए वापस उसी जगह लौटे।
कहा मुझे स्थापित करो
बहुत से लोगों ने प्रयास किया, किंतु वह पत्थर अपनी जगह से एक इंच भी ना हिला। काफी देर तक कोशिश करने के बाद गांव वालों ने यह विचार बनाया कि वापस लौट चलते हैं और कल पत्थर को उठाने के एक नए तरीके के साथ आएंगे।
शनि देव शख्स के स्वप्न में आए
उस रात फिर से शनि देव उस शख्स के स्वप्न में आए और उसे यह बता गए कि वह पत्थर कैसे उठाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि ‘मैं उस स्थान से तभी हिलूंगा जब मुझे उठाने वाले लोग सगे मामा-भांजा के रिश्ते के होंगे’। तभी से यह मान्यता है कि इस मंदिर में यदि मामा-भांजा दर्शन करने जाएं तो अधिक फायदा होता है।
कैसे उठाएं पत्थर
इसके बाद पत्थर को उठाकर एक बड़े से मैदान में सूर्य की रोशनी के तले स्थापित किया गया। आज शिंगाणपुर गांव के शनि शिंगाणपुर मंदिर में यदि आप जाएं तो प्रवेश करने के बाद कुछ आगे चलकर ही आपको खुला मैदान दिखाई देगा। उस जगह के बीचो-बीच स्थापित हैं शनि देव जी।
मंदिर की महिमा
यहां जाने वाले आस्थावान लोग केसरी रंग के वस्त्र पहनकर ही जाते हैं। कहते हैं मंदिर में कथित तौर पर कोई पुजारी नहीं है, भक्त प्रवेश करके शनि देव जी के दर्शन करके सीधा मंदिर से बाहर निकल जाते हैं।
लोगों का विश्वास
रोज़ाना शनि देव जी की स्थापित मूरत पर सरसों के तेल से अभिषेक किया जाता है। मंदिर में आने वाले भक्त अपनी इच्छानुसार यहां तेल का चढ़ावा भी देते हैं।
प्रचलित मान्यता
ऐसी मान्यता भी है कि जो भी भक्त मंदिर के भीतर जाए वह केवल सामने ही देखता हुआ जाए। उसे पीछे से कोई भी आवाज़ लगाए तो मुड़कर देखना नहीं है। शनि देव को माथा टेक कर सीधा-सीधा बाहर आ जाना है, यदि पीछे मुड़कर देखा तो बुरा प्रभाव होता है।
अवश्य जाएं
तो आप शनि शिंगणापुर जाने का प्लान कब बना रहे है? मेरा दावा है कि यहां जाकर आप निराश नहीं होंगे। यह मंदिर वाकई चमत्कारों से भरा है और शिंगणापुर गांव का दृश्य भी जीवन में एक बार देखने लायक तो जरूर है।

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जिन पर हनुमानजी की कृपा होती है, उसका शनि और यमराज भी बाल बांका नहीं कर सकते

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सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना ॥22॥
अर्थ- जो भी आपकी शरण में आते हैं, उस सभी को आनन्द प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक है, तो फिर किसी का डर नहीं रहता।
हिन्दू धर्म के सबसे जाग्रत और सर्वशक्तिशाली देवताओं में हनुमानजी की कृपा जिस पर बरसरना शुरू होती है उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। दस दिशाओं और चारों युग में उनका प्रताप है। जो कोई भी व्यक्ति उनसे जुड़ा समझों उसका संकट कटा। प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ना चाहिए।
हनुमानजी इस कलियुग में सबसे ज्यादा जाग्रत और साक्षात हैं। कलियुग में हनुमानजी की भक्ति ही लोगों को दुख और संकट से बचाने में सक्षम हैं। बहुत से लोग किसी बाबा, गुरु, अन्य देवी-देवता, ज्योतिष और तांत्रिकों के चक्कर में भटकते रहते हैं, क्योंकि वे हनुमानजी की भक्ति-शक्ति को नहीं पहचानते। हनुमानजी की भक्ति और हनुमान चालीसा पढ़ने से व्यक्ति खुद को इन 10 तरह की बाधाओं से बचा लेता है।

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